Friday, December 11, 2015

धरती किसी की माँ नहीं हैं

पश्चिम के देशों ने विकास की रफ्तार में प्राकृतिक संसाधनो को जिस तरह से दोहन करना शुरु किया उस वक्त दुनिया की आबादी महज 1 अरब थी और ये देश अपने आप को विकसित देशों की कतार मे स्थापित कर पाए। चीन आज दुनिया में जिस तरह से इको सिस्टम को बिगाड़ने पर तूला हैं तो उसकी आबादी ही 1.5 अरब के करीब हैं और पूरी दुनियां की आबादी 6 अरब से भी ज्यादा हैं। अमेरिका क्षेत्र के हिसाब से कई देशों से छोटा है और वह दुनिया की सबसे बडीं अर्थव्यवस्था हैं और आज के समय में अमेरिया अगर छिकता हैं तो भी पूरी दुनियां के बाजारों में हलचल मच जाती हैं। पर्यावरण पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत रियो सम्मेलन 1992 से शुरु हुई और अब तक 23 वर्षो में विकसित बनाम विकासशील देशों के बीच खिची लकीर  मिटने का नाम नहीं ले रहीं। जाहिर सी बात हैं ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को कम करनें के लिए सभी देशों को अपनी विकास की रफतार को कुर्बानी देनी होगी जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं यानि मैं अकेला क्यों करुं। ये ठीक वैसे ही हैं जैसे दिल्ली में बढ़ते प्रदुषण के मद्यनजर सरकार कई अहम फैसले लेती हैं तो शुरु होने से पहले ही विरोध शुरु हो जाता हैं यानि देश में भी विकसित बनाम विकासशील समाज की अवधारणा हैं तो इस नजरीए से कोई व्यक्ति या देश किसी को धरती के बढ़ते तापमान के प्रति दोषी नहीं ठहरा सकता । ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में चीन 24 फीसदी के साथ प्रथम स्थान पर हें उसके बाद अमेरिका (12 फीसदी), यूरोपीय संघ(9 फीसदी), जबकि भारत व ब्राजील दोनो 6 फीसदी योगदान करते हैं उसके बाद रुस, जापान, कनाडा, कांगो रिपब्लिक व इंडोनेशिया का नंबर आता हैं। यानि अंतराष्ट्रीय स्तर पर पर्यावरण प्रदुषण के संदर्भ में भारत की स्थिति ठीक वैसी हैं जैसी की हमारे देश में किसी गाँव या मध्यम आबादी वाले शहर की हो जो देश की किसी महानगर जैसे दिल्ली,मुंबई से कम प्रदूषण फैलाते हैं । पर इन महानगरों में बैठे कॉरपोरेट धरानें, लॉबिस्ट सभी किसानों की फसलों को प्रदुषण से जोड़कर देखते हैं और खुद जिम्मेदारी लेने से ठीक वैसे ही कतराते हैं जैसे अंतराष्ट्रीय पर्यावरण सम्मेलन में विकसित देश कतराते हैं।
दुनिया के पर्यावरण में हो रहे अप्रत्याशित बदलाव का असर दिखने लग गया हैं। आधुनिक विकास का यह स्वरुप औधोगिक विकास का बढ़ता प्रारुप हैं और सबसे बड़ी चुनौती हैं कि पृथ्वी के तापमान में कैसे कमी की जाए अगर मात्र 2 डिग्री तापमान बढ़ गया तो कई प्रजातिया विलुप्त हो जाएगी और एक बड़ी आबादी इससें जुडे कुप्रभावों से प्रभावित होगी खासकर भुमध्यरेखा के आसपास वाले देश की बड़ी आबादी शामिल होगी। विषशज्ञों का कहना है कि अगर पृथ्वी का तापमान 4 डिग्री बढ़ जाता हैं तो समुद्र के जलस्तर में बढ़ोतरी का खतरा होगा जिससें अकेले भारत में तकरीबन 6  करोड़ लोग खतरें में होगे। ग्रीन हाउस गैसों के अलावा समुद्री जल भी प्रदुषित होता जा रहा हैं जिससें पृथ्वी का इको सिस्टम खतरें मे हैं भूजल के अधांधुध दोहन के कारण धरती का जल भी लगभग प्रदुषित हो गया हैं। इसी इको सिस्टम के बिगड़नें से देश के अलावा युरोप, अफ्रीका, अमेरिका भी हर वर्ष सुखें की मार झेल रहा हैं। अगर भारत वर्ष की बात की जाए तो देश नें विगत कुछ वर्षों में कई प्राकृतिक आपदाए देखी हैं जैसे उतराखंड, कश्मीर की बाढ। इसके अलावा महाराष्ट्र, तिलंगाना में पड़नें वाला सुखा ......... ये सब इंसानी कारनामों का ही परिणाम हैं।
भारत में अभी पर्यावरण के प्रति गंभीरता नहीं देखी गई अगर देश के आदिवासी या कबाइली समुदायों को छोड़ दे तो कोई भी अपने आप को धरती पुत्र नहीं कह सकता पर आदिवासी व कबाइली समुदाय तो कॉरपोरेट के बनाए कोल्हू में इस तरह से पीसे जा रहें है जिसकी आवाज दब सी गई हैं। अभी राजधानी दिल्ली का उदाहरण लेते हैं जिसमें सरकार नें कोर्ट की फटकार सुननें के बाद राजधानी की हवा को जीनें लायक बनाने के लिए फैसले लिए जिसमें सड़को पर ऑड-ईवन गाड़ी चलाने, बदरपुर पॉवर हाउस बंद करनें, सड़को के किनारे पड़ी कच्ची जगह को हरा भरा करनें, कुड़ा जलाने पर रोक, सड़कों की सफाई मशीनो द्वारा करने आदि आदि। पर देश के इलेक्ट्रोनिक मीडिया का हाल देखिए सिर्फ ऑड-ईवन गाड़ी चलाने के फार्मूले को आधार बना कर जनता में रोष पैदा कर दिया और जनता भी तरह तरह के सुझाव दे रहीं हैं जैसे ऑफिस कैसे जाए? अगर कोई बीमार है तो हस्पताल कैसे ले जाए ? यानि जिनके घर गाड़ी नहीं वो ना ऑफिस जा सकता ना उनके घर का व्यक्ति जो बीमार हो वो इलाज के लिए जा सकता ... कैसे कैसे बेतुके आधार बता कर ऑड-ईवन गाड़ी चलाने के फार्मूले को बंद करवाने में लगे हैं। मान लो अगर ऑड-ईवन फार्मूला लागू हो जाता हैं तो क्या होगा... ज्यादा से ज्यादा जनता को 6 महीनें परेशानी झेलनी पड़ेगी उसके बाद धीरे धीरे स्थितिया बेहतर होगी तो क्या हम जो धरती को अपनी माँ मानते हैं इतना भी नहीं कर सकते अपनी माँ के खातिर। पर जब पंजाब , हरियाणा, युपी का किसान खेत में कचरा जलाते हैं तो दिल्ली में बैठे लोग सांस लेने में दिक्कत महसुस करते हैं और राजधानी का मीडिया भी इसे पर्यावरण के लिए खतरा बताता हैं जबकि यही मीडिया दिल्ली में कार वाले मसले पर जनता की परेशानियो को सामने रखती है । क्या इस मामले में सिर्फ सरकार ही जिम्मेदार हैं जो हवा को भी साँस लेने लायक बनाए और जनता को भी परेशानी ना हो ? इस हिसाब से गाँव मे रहने वाला व देश का किसान तो प्रदूषण के लिए बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं हैं। अगर तुलना करे तो गाँव में रहने वाला व्यक्ति किसी महानगर में रहने वाले की तुलना में 30 फिसदी कम हवा, पानी को गंदा करता हैं । वह शौच से लेकर स्नान तक हर कार्य में किसी महानगरीय व्यक्ति के मुकाबले बहुत कम पानी का इस्तेमाल करता हैं । अगर कॉरपोरेट के बहकावे में आकर कुछ लोग ये तर्क दे की किसान फसलों की सिचांई में ज्यादा पानी इस्तेमाल करता हैं तो ये धारणा भी बिलकुल गलत हैं क्योकि इसके बराबर मात्रा में तो पानी उच्च तबके के लोग अपनी गाड़ी धोनें, स्वीमिंग पुल आदि कार्यों में गवां देते हैं यानि देश का किसान तो बिलकुल भी जिम्मेदार नहीं हैं। देश की बड़ी आबादी धरती की पूजा करती हैं पर जब धरती का कर्ज चुकाने की बात आती हैं तो सब ये कहते हैं कि भगत सिहं पड़ोसी के घर पैदा हों। क्या हम अपनी जीवन शैली में बदलाव नहीं कर सकते हैं । ये ठीक वैसा ही सुझाव हैं जैसा कि पर्यावरण पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन में विकसित देश व विकासशील देश एक दूसरे को देते हैं । यानि जीवन शैली में बदलाव का मतलब हैं आय में कमी व आय की कमी इतनी भी कम नहीं होगी की इंसान जी नहीं पाएगा... हाँ हमारी भोगविलासिता कम हो जाएगी । इसी भोगविलासिता के कारण ही तो धरती का तापमान आज बढ़ता जा रहा हैं और इसका दोष विकसित देश विकासशील देशों पर व देश के महानगरीय लोग गाँव के ढांचे को दोषी मानते हैं। पर सही मायनों में गाँव व छोटें शहरों के लोगों का योगदान बहुत ही कम हैं। अगर आज देश के कुछ गाँवो का स्वरुप बदलता जा रहा हैं तो उसका दोष बढ़ते औधोगिकरण को जाता हैं जिसमें गुजरात, महाराष्ट्र, बंगाल, हरियाणा, हिमाचल, उतराखंड , झारखंड, औडिशा व कुछ और भी राज्य आते हैं जहाँ एसईज़ेड के नाम पर ऊपजाऊ भूमि कंक्रीट में बदलती जा रहीं हैं।
हमें अपनी जीवन शैली में बदलाव करने होगे जिसकी शुरुआत महानगरों से होनी चाहिए जैसे जो व्यक्ति हमेंशा रोज के भोजन में माँसाहार लेता हैं वह उसको थोड़ा कम कर दे क्योकि बीफ या मीट को पकाने में सबसे ज्यादा ईंधन लगता हैं जो कही ना कही पर्यावरण में CO2 ज्यादा मात्रा में भेजता हैं। रोजमरा के कार्यों में पानी के इस्तेमाल पर पैसे की तरह कंजूसी बरते, प्लास्टिक से बनें उत्पादों का इस्तेमाल कम करें, घरों में इस्तेमाल टायलेट के रुप में कम पानी इस्तेमाल होने वाली टायलेट सेट लगवाये, अपनी कार या वाहन को पानी से धोने में सावधानी बरते कि पानी कम खर्च हो, इलेक्टोनिक गैजेट्स को मानक सीमा के अनुरुप ही चलाए आदि । ये उपाय देखने में छोटे लगते हैं पर इनका प्रभाव गहरा पड़ेगा। रही बात किसान या गाँव से  जुडी तो वहा तो सब चीजें रिसाइकल होती हैं पशु के गोबर से लेकर घर के खाने तक और रही बात फसलों में पड़ने वाले रसायन के इस्तेमाल की तो ये भी किसान के हाथ मे नहीं हैं क्योकि फसलों का मूल्य सरकार निर्धारित करती हैं अगर मूल्य सही होगा तो किसान पैदावार बढ़ानें की बजाए गुणवता पर जोर देगा। और जब राजधानी में बैठे लोगो को धान के कचरें से समस्या होगी तो वो भी किसान नहीं जलाएगा क्योकिं उसका इस्तेमाल भी खेत में हो जाएगा पर पहल सबसे पहले देश में उपरी तबके से हो जो धरती को मौखिक रुप में माँ मानता हैं जबकि वह असल में दतक पुत्र हैं जबकि असली धरतीपुत्र किसान तो अपने हिस्से कि सेवा कर ही रहा हैं।


Wednesday, May 13, 2015

जट दी अरदास

मै पूत हां किसान दा ... गल करदा तकळे वन्गू सीदी
मै इसी मिट्टी दे विच जमया हां.... ऐहे जमीन साडी मां हुंदी,
दिल्ली दी संसद चे बह के तुस्सी करदे हो गल साडे हक दी,
पर दिल्ली नहीं जानदी गल साडे दिल दी,
बणिये , साहुकारां ते पत्रकारा नूं वल अपणे करके सरकारा सानू फायदे दसदी हैं
पर जट दे पांव जडों जमीन दे पैदे हैं ता साडी जमीन भी हंसदी हैं....ते कहदी हैं...
जटा अज गल तेरी पग ते आ खड़ी हैं.... सभाल पग अपणी,
भावे पेजे अज 32 बोर चकणी....
एक एक दे गीटे भन्न दई.... गल बद जे ता वेरीया नू सफेदेया दे टंग दई....
पर जटा मै तेरी माँ हां... मां दी राखी लई तू अपणा शीश वी ला दई...
अज दिया सरकारा नूं साडी लगदा फिक्र बाळी हैं...
पर ओना नू की पता होदा की पंजाळी हैं....
औहो झूटे लंदे 20 लख दी गडिया ते,,, मै झूटे लंदा हा 20 फुट लम्बे सुहागे ते....
बस करो सियासत दे बंदयो....तुहाडे झास्या चे नहीं आणा.... तुस्सी ता हो ही इने झूटे की साख करादो ...
भांवे बंदा होवे काणा....

बस ईनी जेही विनती हैं कि अपनी भेड़ी नज़रा दूर रखों साड़ी पेळीया तो...

Sunday, September 22, 2013

वर्तमान राजनीति में मैकियावेली

निकोलो मैकियावेली इटली का राजनयिक एवं राजनैतिक दार्शनिक, संगीतज्ञ, कवि एवं नाटककार था। पुनर्जागरण काल के इटली का वह एक प्रमुख व्यक्तित्व था। वह फ्लोरेंस रिपब्लिक का कर्मचारी था। मैकियावेली की ख्याति उसकी रचना द प्रिंस के कारण है जो कि व्यावहारिक राजनीति का महान ग्रन्थ स्वीकार किया जाता है। मैकियावेली के विचारों की प्रासगिकता आज के दौर में भी उतनी ही हैं जितनी कि युरोप में पुनर्जागरण काल में थी। भारत की राजनीति व्यवस्था संधीय (फेडरल) ढाँचे पर टिकी हैं यानि भारत राज्यों का संघ हैं। सवा सौ करोड़ से भी ज्यादा की आबादी वाले देश में औसतन हर 50 किलोमीटर पर भाषा की विविधता देखनें को मिल जाती हैं। आजादी के बाद से भारत 90 के दशक तक अपनें औधोगिक उत्पादन व निर्यात बढ़ानें पर दे रहा था और इसी 90 के दशक के बाद देश में एक नए बाजार व्यवस्था कि शुरुआत हुई जिसे वर्तमान में निजीकरण की संज्ञा दी जाती हैं। देश आगामी साल की दुसरी तिमाही में 16वी लोकसभा के लिए अपनें मताधिकार का प्रयोग करनें जा रहा हैं । आज देश में हर 10 में से 4 के करीब 30 वर्ष के युवा हैं जो आज भी शैक्षिक योग्यता में अपनें आप को तराशनें में लगा हैं जबकि बुनियादी जागरुकता यानि अधिकार, व्यवस्था या प्रशासनिक जानकारी के नाम पर योग्यता ना के बराबर हैं। 2012 में देश की राजधानी में गाँधीवादी विचारधारा के अण्णा हजारे के आंदोलन को भी स्पीड पकड़ने में 3 दिन का समय लगा जब दिल्ली के मीडिया हाउस को लगा की अण्णा हजारें वो अंगार हैं जिस पर हाथ सेकनें के साथ साथ रोटी भी पकाई जा सकती हैं और इस बात का अहसास मीडिया नें अण्णा के मुबई में हुए आंदोलन में करा दिया था जिसका प्रसारण एक फ्लैस न्युज के रुप में ही प्रसारित हुई।
निकोलो मैकियावेली ने राजनीति को प्रयोगशाला के रुप में माना जहाँ सरकार नए विचारों के साथ जनता में अपनी बात रखें और युवाओं को राजनीति को मुख्य विचारधारा में शामिल होने पर बल दिया । Politics has no relation to marals…. मैकियावेली का सार हैं ।  मैकियावेली राजनेताओं को विरोधियों के प्रति कठोर रुख अपनानें को कहते थें जो दिग्विजय सिंह की शैली का प्रमुख हिस्सा हैं। निस्देह इस बात में कोई शक नहीं की दिग्विजय सिंह इतनें मझे हुए राजनेता हैं जो विरोधी का मुँह खुलवानें में माहिर हैं। भारतीय चुनाव के समय में सभी राजनेतिक दल निकोलो मैकियावेली के सिर्फ विरोधियों पर कठोर रुख अपनानें वाले बिंदु पर ध्यान देते हैं और राजनैतिक व्यवस्था को बदलनें की बजाय समाजिक ध्रुविकरण पर जोर देते हैं और इसका दोष राजनैतिक दलों पर लगाने की बजाए जनता पर ही लगाना उचित होगा क्योंकि वोटर हमेशा दिशाहिन या जातिय सोच के आधार पर वोट डालनें जाता हैं बजाय कार्यात्मक समीक्षा के। भारतीय मीडिया हाउस जिसमें खासकर इलेक्ट्रोनिक मीडिया शामिल हैं, वर्तमान में पुरी तरह से किसी ना किसी राजनैतिक पार्टी से जुड़ चुके हैं जो लोकतंत्र के लिए भयावह स्थिति पैदा करती हैं । एंकर अपनी निजी राय को जनता की राय बताकर दर्शको पर थोपनें का प्रयास करता हैं या आक्रामक होकर विरोधी पार्टी के मेहमान को बोलनें का मौका ही नहीं देता हालाकि ये सब वह फ्री में नहीं करता।
देश में प्रधानमंत्री के पद को मजाक बनानें में मीडिया का योगदान किसी से छुपा नहीं हैं यानि किसी भी व्यक्ति को प्रधानमंत्री के पद के लिए दावेदार के रुप में पेश कर दिया जाता हैं इससें मुलायम, मायवती, शरद पवार सरीखें नेता डटें रहनें का हौसला रखनें लगते हैं। बीजेपी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी को काग्रेस मीडिया की उपज मानता हैं पर मोदी को नकार सकते है पर उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता हैं। निकोलो मैकियावेली का जिक्र करना हर परिदृश्य में जरुरी हैं क्योंकि मैकियावेली के सिद्धानतों के अनुरुप राजनेता नहीं तो वोटर का चलना जरुरी हो गया हैं। हाँ एक बात जिस पर आज पूरे देश की निगाह हैं कि अगर बीजेपी को बहुसत के करीब सीटें मिलती हैं तो क्या नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बन पाएगें तो इसकी सभाँवना मात्र 25 फीसदी बचती हैं वो भी इस सुरत में अगर बीजेपी 250+ सीटें लाती हैं जो संधीय राज्यों वाले देश में वर्तमान में मुश्किल हैं। हालाँकि मिडिया का एक तबका ये बात जानता हैं पर राजनीति में आम नागरिक हमेंशा आनें वाले हादसों से अनजान ही बना रहता हैं ।इस बात का अदेशा शायद मोदी को भी हैं इसलिए वो मुख्यमंत्री पद को छोड़ नही रहें। क्योंकि आडवाणी जी को अकेला मानना विश्लेषको की सबसे बड़ी भूल होगी और इस बात पर बीजेपी की सेन्ट्रल लीडरशीप एक साथ हैं सिवाय अरुण जेटली के। आगामी लोकसभा चुनाव में जहां सता पक्ष अपने विकास कार्यो का लेखा जोखा लेकर चुनाव मैदान में कुदेगा वही विपक्ष मोदी और युपीए के घोटालों के नाम पर जनता के बीच जाएगा जबकि उसके पास अपनी कोई स्पष्ट निति फिलहाल नहीं हैं और मीडिया भी अभी स्पष्ट रुप से किसी एक के पक्ष में खुल कर सामने आने से बच रहा हैं क्योंकि 6 नेशनल व सैकड़ो क्षैत्रिय पार्टियों वालें देश में किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के लिए 272 का आँकड़ा पर करना मुश्किल हैं। जहाँ एक तरफ राहुल गाँधी राजनीति को जहर बताते हैं तो अगले ही दिन युवाओं से आह्वान करते हैं कि राजनीति में आकर देश की प्रगति का हिस्सा बनें। तो क्या माना जाए कि पोलिग के बाद जनता का काम खत्म हो जाता है ऐसी परिस्थिति में मैकियावेली जनता के गुस्से को रिवॉलूशन एगेस्ट मेंडेट की संज्ञा देते हैं जिसका परिणाम किसी भी विविधता वाले देश में खतरनाक साबित होगा। अगर आज के राजनेता मैकियावेली के विचारों के अनुरुप चलें व मीडिया अपना रवैया निष्पक्ष रहें तो आगामी लोकसभा में संसद में किसी भी विधेयक को अध्यादेश के रुप में पेश करनें की गुजाँइश नही रहेगी और संसद का नजारा किसी देवस्थान से कम नहीं होगा।

Monday, July 30, 2012

प्रमाणिकता के लिए कितना जायज हैं लिंग प्ररीक्षण


लॉरेनॉ रेक्स केमरोन, रेयान कई ऐसे नाम है जिन्होनें कुदरत को चुनौती दी। जन्म से ये लोग स्त्री लिंग के साथ पैदा हुए जो बाद में जेन्डर ट्रांस के जरीए पुरुष बनें। लॉरेना रेक्स आज पेशेवर रुप से फोटोग्राफर हैं । एंड्रियास क्रिगर जन्म से पुरुष थें जिन्हे महिला एथेलिट के रुप में जर्मनी के लिए कई प्रतिस्पधाए खेली। लॉरेनॉ रेक्स केमरोन नें फिमेंल सिम्प्टम के बावजुद अपने आप को पुरुष के लिहाज से जिने के लायक बनाया । भारत की पिंकी प्रमानिक का उदाहरण अलग हैं। पश्चिमी बंगाल के पुरलिया में जन्मी पिंकी पेशेवर धावक हैं जिसने 2006 के एशियन खेलों में स्वर्ण व 2006 के ही कामनवेल्थ खेलों मे रजत पद से देश का गौरव बढाया हैं। इसके अलावा कई उपलबधिया उनकें नाम है।
14 जुन 2012 को पिंकी की महिला मित्र नें यह आरोप लगाकर सनसनी मचा दी की पिंकी पुरुष हैं व उसनें उसके साथ शारारिक संबध बनाए हैं। अगले दिन पुलिस पिंकी को गिरफ्तार कर 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में ले लेती हैं जहां उसका डीएनए टेस्ट के लिए सैम्पल भी लिए गए। इसी बीच पिंकी का एक एमएमएस सोशल साइटस, युट्युब पर आ जाता हैं जिसमें पिंकी के सेक्स परीक्षण संबधी अंगों को दिखाया गया, ये कृत्य बड़ा ही धिनौना था जो उस खिलाड़ी का सबसे बड़ा अपमान था जिसनें देश का खेल में प्रतिनिधित्व किया हैं। हालाकि बाद में कई अन्य खिलाडी पिंकी के न्याय के लिए खड़े हुए, पिंकी की हिरासत के दौरान हुए गलत व्यवहार  का विरोध किसी भी उस खिलाड़ी नें नहीं किया जो आज के समय टीवी पर चलनें वाले हर विज्ञापन में नजर आते हैं जो निहत ही स्वार्थी प्रवृती दर्शाती हैं। पिंकी के मामले में मीडिया की भुमिका भी संदेह के घेरे में आती है, खासकर टीवी मीडिया। इस बीच पिंकी पर आरोप लगानें वाली साथी के बारे में ख़बर आई कि उसनें पिंकी पर यह आरोप सीपीआईएम की नेता ज्योत्रिमोई सिकदर के कहनें पर लगाए है क्योंकि पिंकी व ज्योत्रिमोई सिकदर के पति अवतार सिंह के बीच भुमि विवाद चल रहा हैं। अब सवाल उठता हैं कि इस पुरे वाक्य में दोषी कौन हैं पिंकी,राजनेता, पिंकी पर आरोप लगानें वाली उसकी मित्र या ईश्वर.... ?
इससे पहले इस तरह की घटना दोहा में 2006 हुए एशियन खेलों के दौरान हुई। जिसमें भारतीय महिला धावक सनथी सुदराजन के स्त्री होनें को चुनौती दी गई । जब सनथी नें दोहा में महिला 800 मीटर रेस में रजत पदक जीता उसके तुरंत बाद उन्हें लिंग परीक्षण से गुजरना पड़ा जिसमें यह सामनें आया की सनथी में महिला होनें का कोई जैविक गुण मौजुद नहीं हैं। बाद में उनसें पदक वापिस ले लिया गया । हालांकि इस तरह के टेस्ट किसी भी खेल में भाग लेने वाले खिलाड़ी के लिए आवश्यक नहीं हैं पर  इंटरनेशनल ऐसोसिएशन ऑफ एथेलिटिकस फेडेरेशन (आईआईएएफ) विशेष परिस्थितियों में खिलाड़ी से इस तरह के परिक्षण डॉक्टरों की विशेष टीम से करवानें का अनुरोध कर सकता हैं। सनथी सुदराजन के कोच नें यह दलील दी की सनथी भारत का जन्म पिछड़े इलाके में हुई जहाँ कुपोषण काफी हैं ऐसे में जब सनथी नें एथलीट के रुप में पोष्टीक आहार लेना शुरु किया, हो सकता हैं कि इस कारण से ये बदलाव आया हो। 2006 सनथी सुदराजन को तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री करुणानिधी नें 15 लाख रुपयें की आर्थिक सहायता दी जिसे सनथी सुदराजन के साथ हुए अपमान की भरपाई के रुप में देखा गया । वर्ष 2007 में सनथी सुदराजन नें सुसाईड करनें की कोशिश की पर ईश्वर नें बचा लिया जिसकी प्रमुख वजह उसके सामाजिक अपमान व आर्थिक हालात को माना गया। बाद में सनथी सुदराजन नें अपने गृह जिले पुदुकोट्टी में स्पोर्टस अकादमी की शुरुआत की व एथलीट कोच बनी। सनथी के हौसले नें सनथी को दुबारा खड़ा किया पर हाल की रिपोर्ट के अनुसार सनथी आज ईट भठ्ठे पर काम कर रही हैं और उसे महिला की हैसियत से कार्य मिला है व जिसकी दैनिक दिहाड़ी मात्र 200 रु हैं,जो समाज के दो रुपों को स्पष्ट रुप से उजागर करता हैं। अगर किसी चीज की कमी है सनथी को, तो वह है समाजिक स्वीकार्यता।
पिंकी व सनथी का महिला या पुरुष होना अगर जैविक रुप से निर्धारित होता हैं तो उसके बाद की परिस्थितियों के लिए किसे जिमेदार ठहराया जाए .... ? जैविक विज्ञान में अगर किसी महिला में पुरुष के लक्षण या फिर किसी पुरुष में महिला के लक्षण हो तो इसे एण्ड्रोजन इंनसेन्सिटीव सिंड्रोम माना जाता हैं यानि ऐसी परिस्थिती में पुरुष लिंग निर्धारित करनें वाला Y क्रोमोसोम स्त्री के शरीर में X क्रोमोसोम के साथ मिल तो जाता हैं पर जेनेटिक मेकअप सेल (एण्ड्रोजन) में निष्क्रिय रहता हैं और ऐसी स्थिती में फिमेल बॉडी टेस्टास्टरोन (वृषणी) तो पैदा करती हैं पर किसी तरह के हार्मोन होने की अभिक्रिया नहीं पैदा करती। अर्थात बिना किसी जनन अंग में परिवर्तन के स्त्री के  बाईलोजिकल टेस्ट में Y क्रोमोसोम दिख जाता हैं जिससें उसे पुरुष माना जाता हैं।यानि मौटे तौर पर देखा जाए तो लिंग निर्धारण का केन्द्र क्रोमोसोम हैं। ठीक इसी तरह का वाक्या दक्षिण अफ्रीका की महिला धावक कास्टर सेमेन्या के साथ हुआ पर वहां कि सरकार नें सेमेन्या को पुरा सहयोग दिया जिसमें जीत सेमेन्या की हुई व दुबारा रेसिंग ट्रेक पर लौटी।
उपरोक्त वाक्यों से स्पष्ट हैं कि सारा दोष ईश्वर का हैं अगर उसके बाद कोई जिम्मेदार हैं तो वह हैं जैविक थयोरी। अगर कोई महिला के गुणों के साथ पैदा हुई हैं (जिसमें हाव-भाव, लिंग, शारीरिक बनावट आदि शामिल हैं), पर एण्ड्रोजन इंनसेन्सिटीव सिंड्रोम की वजह से जैविक टेस्ट में Y क्रोमोसोम उसमें पाया जाता हैं तो उसे पुरुष मान लिया जाता हैं जो पुरी तरह से न्यायसंगत नहीं हैं। बायलोजिकल टेस्ट में पुरुष पाए जाने वाला शख्स क्या संतान पैदा करनें में सक्ष्म है .... ? उसकी बॉडी में से पैदा होने वाले टेस्टास्टरोन सक्रिय हैं.... ? इन बिन्दुओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। खेल हो या सामाजिक जीवन किसी भी इंसान को लिंग परीक्षण के आधार पर बहिष्कार करना अनुचित हैं ।खेल के माध्यम से खिलाड़ी विश्व मंच पर अपने देश की पहचान बनाता हैं ऐसे में या तो प्रतिस्पर्धा से पुर्व ही सभी खिलाड़ियों का गुप्त परीक्षण हो ताकी बाद में ऐसी परिस्थितियां न पैदा हो की कोई अपना जीवन जौखिम में डाले। आईआईएएफ को भी इस दिशा में कदम उठानें की जरुरत हैं । आज तक सिर्फ एथलीट पर ही इस तरह के विवाद सामने आए हैं जबकि अन्य खेलों में ऐसे विवाद सामनें नहीं आए है । पिंकी का बाइलोजिकल टेस्ट जो भी हो पर महिला होने का सम्मान उसे हमें देना ही होगा। अगर ईश्वर नें किसी कमी के साथ किसी भी इंसान को धरती पर भेजा हैं जो उसे संम्पुर्ण इंसान बनाने का जिम्मा समाज का बनता हैं। 

Monday, July 23, 2012

सुंदर और अमीर विरासत हैं भारतीय संस्कृति


भारतीय संस्कृति विभिन्न संस्कृतियों, अपने पड़ोसियों की परंपराओं और अपने स्वयं की प्राचीन विरासत है, जिसमें बौद्ध धर्म , वैदिक युग, स्वर्ण युग, मुस्लिम विजय अभियान और यूरोपीय उपनिवेश की स्थापना , विकसित सिंधु घाटी सभ्यता आदि का मिश्रण है. भारतीय संस्कृति में विभिन्न संस्कृतियों जो बहुत अनोखी है और अपने स्वयं के एक मूल्य है एक महान मिश्रण को दर्शाती है. भारत के सांस्कृतिक प्रथाओं, भाषा, सीमा, परंपराओं और हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म, और सिख धर्म के रूप में धार्मिक प्रणाली की विविधता को दर्शाती है. विभिन्न समृद्ध संस्कृतियों का अनूठा मिश्रण एक महान विस्तार के लिए दुनिया के अन्य भागों को प्रभावित किया है.
भारत में बोली जाने वाली भाषाओं की एक संख्या उसके विविध संस्कृति को जोड़ने का काम करती है. वर्तमान में भारत में 415 के करीब भाषा है, लेकिन भारतीय संविधान में हिन्दी के प्रयोग और अंग्रेजी संचार के दो आधिकारिक भाषाओं में संघ सरकार के लिए की घोषणा की है. व्यक्तिगत राज्य के आंतरिक संचार के अपने स्वयं के राज्य की भाषा में कर रहे हैं. भारत में दो प्रमुख भाषाई परिवारों इंडो - आर्यन , जो उत्तरी, पश्चिमी, मध्य और पूर्वी भारत तक ही सीमित है और द्रविड़ भाषाओं नें दक्षिणी भारत कों सीमित किया हैं।
चिदंबरम, रामेश्वरम, कांचीपुरम, मदुरै, और कई स्थान भारतीय वास्तुकला के लिए अविस्मरणिय है, वहीं  दक्षिण के महान मंदिर , विजयनगर साम्राज्य के वास्तुशिल्प भव्यता और मुगल वास्तुकला खजुराहो के कामुक मूर्तियां , दिल्ली, आगरा, और फतेहपुर सीकरी या उनके बेदाग जाली का काम के साथ जैसलमेर की हवेलियों आदि को देखनें से पता चलता हैं कि भारत कि कला व सस्कृति कितनी उमदा हैं।
भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों और अच्छा शिष्टाचार का आईना

Saturday, July 9, 2011

बे-लगाम होता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ


29 जुन को प्रधानमंत्री की प्रिंट मिडिया के चुनिंदा सम्पादकों के साथ हुई बैठक में डॉ मनमोहन सिंह ने एक नए विषय पर चिंता व्यक्त की, कि देश मे मीडिया (कुछ को छोड़कर) कार्यपालिका और न्यायपालिका की भूमिका निभाने लगा हैं जो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए ठीक नहीं हैं। अगले दिन दिल्ली से छपने वाले कुछ समाचार पत्रों ने प्रधानमंत्री के इस ब्यान को हेडलाइन के साथ प्रकाशित किया, जबकि इका दुका समाचार चैनल ने इस ख़बर को अपनी हैडलाइन के लायक समझा। आम बोलचाल की भाषा में कहें तो ये बात ख़बर के लायक थी ही नहीं।
मीडिया भी समाज का अंग हैं यानी जिस तरह समाज में विभिन्न विचारधारा के लोग होते है ठीक उसी तर्ज़ पर मीडिया हाउस हैं। का़यदे से मीडिया स्वतंत्र तंत्र हैं यानी सरकार की तरह , जो सवेंधानिक ढांचे पर काम करती हैं और किसी वर्ग विशेष से पक्षपात नहीं कर सकती और सरकार के प्रहरी के रुप में विपक्ष हैं । जबकि मीडिया इन सबका माध्यम हैं जो हर किसी के विचार, जनभावनाओ आदि के लिए स्वतंत्र मंच हैं। धीरे धीरे ये मंच प्रायोजित होने लगा हैं और जो लोग इस मंच के प्रायोजक हैं उनकी भाषा हैं सिर्फ़ मुनाफा। और इसी मुनाफ़े की चितां प्रधानमंत्री को हैं। हाल ही कि कुछ घटनाओ पर मीडिया का रुख़ अस्पष्ट था पल मे अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव हीरो बन गए । अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव की मांगे जायज है या नहीं , बल्कि सवाल है कि लोकपाल , भष्ट्राचार, काले धन के मुद्दों को ज्यादातर मिडिया हाउस ने इससे पहले इतनी संजिदगी से क्यों नहीं लिया ? ख़ासकर इलेक्ट्रानिक मिडिया ने, क्योंकि इलेक्ट्रानिक मिडिया का प्रभाव व्यापक हैं। दरअसल मीडिया उस चाक की छड़ी की तरह होता जा रहा हैं जो सिर्फ़ बाहरी शक्ति द्वारा संचालित होता हैं। जिस तरह कुम्भकार छड़ी से चाक को घुमा कर उसे साइड रख देता हैं और घुमते हुए चाक को कब रोकना हैं ये कुम्भकार पर निर्भर हैं ।किसी भी उपकर्म, सार्वजनिक निकाय या सरकार की मंशा को भांपकर होने वाली सम्भांवित हानि को रोकना मीडिया का उद्देश्य होता है न कि सरकार के कार्यों में दख़ल अनदाजी करना यानी सही या ग़लत का फैसला करना। सरकार के फैसलो पर चर्चा, विवेचना की जा सकती हैं ।
 पिछली यूपीए सरकार के विश्वास मत के दौरान एक समाचार चैनल ने स्टिंग आपरेशन का दावा किया जो बाद में प्रसारित नहीं हुआ, नाराज़ होकर बीजेपी ने उस चैनल का बॉयकाट किया, यानी चैनल किसी प्रार्टी का मंच हैं। कुछ पत्रकार कॉरपोरेट व सरकार के मध्यस्थ बने हुए हैं। चुनाव के समय तो सौदेबाज़ी चरम सीमा में पहुँच जाती हैं। इन सबके बावजुद ऐसे मीडिया हाऊस पर किसी भी तरह की कार्यवाही नहीं होती।
ब्रिटेन के 168 साल पुराने अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्ड पर मोबाइल फोन हैक करने का आरोप लगा , जिसके चलते न्यूज इंटरनेशनल ग्रुप के चेयरमैन जेम्स मडरेक ने अखबार को बंद करने का फैसला किया हैं इसी जेम्स मडरेक की मजबुरी कहे या रणनीति, जो भी हो एक बात साफ़ हैं कि मीडिया का व्यवसाय ठीक किसी टीचर (अध्यापक) के समान हैं अगर किसी पर एक बार दाग लग जाए तो विश्वनीयता का़यम नहीं रहती।
जब नागरिकों के लिए आचार संहिता हो सकती हैं तो मिडिया के लिए भी दिशा निर्देश अनिवार्य होने चाहिए।

Tuesday, April 26, 2011

मुनाफे का गणतंत्र


आज़ादी के बाद हुई 7 वी जनगणना में भारत की आबादी तक़रीबन 121  करोड़ हैं जिसमे पुरुष 62 करोड़ 37 लाख व महिलाएं 58  करोड़ 64 के करीब हैं व 74 .04 फीसदी साक्षरता हैं दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी हमारे देश की हैं ये 121 करोड़ का आंकड़ा कई मायनो में महत्वपूर्ण हैंमसलन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाज़ार , सबसे बड़ी युवा आबादीविभिन्न बोली - धर्म के लोग आदि….आदि | और क्रिकेट में जीत भी इसी बाज़ार का हिस्सा हैं क्यों की 121  करोड़ के बाज़ार में कोल्ड ड्रिंक तभी बिकेगी जब उस पर धोनी का फोटो होगा ऐसे में 2 करोड़ की आबादी वाले श्रीलंका का जितना किसी के लिए भी फायदेमंद नही होता | इतनी बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व कॉर्पोरेट सरकार के हाथ में हैं | वर्तमान में जो उथल पुथल चल रही हैं वो यकायक नही हैं .........जनता तक जो जानकारी पहुचती हैं उसका माध्यम मिडिया हैं, देश में कई घोटाले जेसे एस बेन्ड, 2G स्केम, कॉमनवेल्थ घोटाला, मनरेगा, या फिर PDS सिस्टम में अनियमितता के मामले सामने आये हैं इनमे से एस बेन्ड को छोड़ कर किसी को रोकने में न तो मिडिया कारगर साबित हुआ हैं और न ही विपक्ष ..........| गठबंधन की दुहाई देकर मोजुदा सरकार चाहे जनता से सहानुभूति लेना चाहे पर विपक्ष व मिडिया की मज़बूरी चिंताजनक हैं | जंतर मंतर पर अन्ना हजारे के साथ खड़े लोग अपना गुस्सा प्रकट कर रहे थे हर कोई उनके समर्थन में खड़ा था जनता का अपने चुने हुआ नुमायन्दो के खिलाफ रोष प्रकट करना जायज हैं ऐसे में विपक्ष का अन्ना को समर्थन देना विपक्ष की भूमिका को ख़त्म करने का संकेत हैं | चूँकि जो मोनेटरिंग का काम विपक्ष को करना चाहिए उसमे वो पूरी तरह से फेल साबित हुआ हैं ऐसे में सदन में विपक्ष का बने रहना अनुचित हैं उसे सरकार को बाहर से समर्थन देने वालो में गिनना ज्यादा प्रासंगिक होगा |
भर्ष्टाचार की शुरुवात गणतंत्र के निचले पायदान से होती हैं मसलन पंचायत से | पंचायत से लेकर संसद निधि की मोनेटरिंग के लिए देश में हजारो की संख्या में ब्युरोक्रेटेस तैनात हैं और सिस्टम की जानकारी ऊपर दिए गए 74 .04 फीसदी साक्षरता लोगो में से महज कुछ ही प्रतिशत लोगो को हैं साथ ही जनता का उदासीन रवैया यानि हर मुद्दे पर मौन रहना और चुनाव के समय आधारहीन मुद्दों पर मतदान करना ...और इन सब का फायदा ब्युरोक्रेटेस व जनप्रतिनिधि उठाते हैं |ऐसा नही हैं की सभी नेता या नोकरशाह गलत हैं लेकिन सही की संख्या गौण हैं | जन लोकपाल बिल, जो वर्षो से सदन में लंबित हैं आज तक किसी राजनेतिक दल ने इसे पास करने में तत्परता नही दिखाई हैं |अन्ना का रोष ऐसे समय बाहर आया हैं जिस समय एक के बाद एक घोटाले सामने आ रहे हैं और जनता के रोष को देखते हुए सरकार भी हरकत में आ गई अब जिस तरह का घटनाक्रम चल रहा हैं उससे साफ हैं की आगामी मोनसून सत्र में इसे पेश किया जायेगा पर इस बात को अन्ना भी जानते हैं की बिना सदन के बहुमत के इसे अमली जामा नही पहनाया जा सकता |अब सवाल उठता हैं की इस बिल के पक्ष में कौन वोटिंग करेगा | क्योकि हर राजनेतिक दल घोटालो की चारदीवारी से घिरे हुए हैं |






आंकड़ो में उलझता आम आदमी ना तो सिस्टम को समझ पाता हैं और ना ही उसे समझाने की कोशिश की जाती हैं अगर एक तरफ RTI सरीखे कानून बनते हैं तो दूसरी और गोपनीयता के आभाव में जनता भी इसके इस्तेमाल से कतराती हैं सिस्टम को दुरुस्त करने में जन लोकपाल विधेयक कारगर होगा बशर्ते इसे लचीला नही बनाया जाये ,मसलन केंद्र में लोकपाल व राज्य में लोकायुक्त को अपंग नही बनाये जाये ,जेसे की आज केंद्रीय सत्रकता आयोग और सी.बी.आई . हैं यानि कार्यपालिका और विधायिका को स्वतंत्र रखना होगा  |
देश की 121 करोड़ की आबादी पर दुनिया की नज़र हैं तभी तो अमेरिका भी भारत की राजनीती में गहरी रूचि रखता हैं धन्य हैं विकिलीक्स का ,जिसने इसे दुनिया के सामने रखा |अब देश की जनता को समझना चाहिए की आर्थिक मंदी के दौर में ओबामा का भारत दौरा और संसद को संबोधित करते हुए गाँधी का गुणगान व अपने भाषण के अंत में जय हिंद कहना कोई भारत के प्रति प्रेम नही था बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को हम 121 करोड़ लोगो के ज़रिये सुद्रढ़ बनाना था | वर्तमान में देश में पैदा होने वाले गेहूं में गाज़र घास जिसे कांग्रेस घास के नाम से भी जाना जाता हैं अमेरिका की ही देन हैं,जिसकी मात्रा खाने में होने से अस्थमा का खतरा बना रहता हैं, लेकिन किसी भी सरकार की रूचि विदेशी सहयोग में ज्यादा रहती हैं वरना दो लड़ाकू जहाज के बदले देश के तक़रीबन साढ़े छ: लाख गावों को हेंडपंप के जरिये पीने का पानी मुहैया करवाया जा सकता हैं | इसके समाधान के लिए राईट टु रिकाल का होना भी बेहद ज़रूरी हैं जिससे लोकतान्त्रिक व्यवस्था में सरकार की जनता के प्रति जवाबदेही तय होगी, दूसरा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए शेडो केबिनेट की भी अहम् भूमिका हो सकती हैं जिसमे विपक्ष सरकार के समकक्ष कार्य करता हैं दुनिया के कई देश इसराइल , स्कॉट्लैंड ,केनेडा, थाईलेंड ,इटली , ब्रिटेन आदि ने इस मॉडल को अपनाया हैं जिसके अच्छे परिणाम हैं | और साथ ही  मतदाताओ के सामने पक्ष व विपक्ष के कार्यो का मूल्याकन रहता हैं | सांसद निधि जिसकी शुरुआत नरसिम्हाराव सरकार ने की उसका आज कोई ओचित्य ही नही हैं क्यों की सेकड़ो योजनाओ का बजट बनता हैं जिसमे केंद्र और राज्य सहभागी होते हैं |
कानून ने जनता को अचूक ताकत हैं पर क़ानूनी जानकारी का आभाव ही इन घोटालो की मुख्या वजह हैं , पंचायत स्तर पर ना तो ग्राम सचिव लोगो को जानकारी देता हैं और ना ही जनता अपने अधिकारों  को जानती हैं | बिहार सरकार का नया राईट टु सर्विस बिल इसकी शुरुआत हैं जो नोकरशाह को जनता के प्रति जवाबदेह बनता हैं |
देश की ताकत और कमजोरी उसकी आबादी ही होती हैं अगर हम आज जागरूक हैं तो आने वाला हमारा कल सुरक्षित व सुनहरा हैं चाहे उसे कुछ लोग ना देख पाए पर आने वाली पीढ़ी हमेशा त्रृणी रहेगी जेसे आज हम अपने उन देशभक्तों के त्रृणी हैं जिनकी बदोलत खुली हवा में साँस ले रहे हैं | वरना आज गणतंत्र के मुनाफे को भोगने के लिए कई मुहँ खुले हैं और कुछ इस इंतजार में हैं की कुछ निवाला उनके मुहँ में भी आ जाये |

Sunday, February 6, 2011

विनायक सेन : सिस्टम की उपज…………..

"ईश्वर ने सब मनुष्यों को स्वतन्त्र पैदा किया हैं, लेकिन व्यतिगत स्वतंत्रता वही तक दी जा सकती हैं, जहाँ दुसरो की आजादी में दखल न पड़े यही रास्ट्रीय नियमो का मूल हैं” जयशंकर प्रसाद का ये कथन किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए सटीक बैठता हैं तो आखिर विनायक सेन ने ऐसा क्या किया की उन्हें रायपुर के जिला सत्र न्यायालय ने उम्रकैद की सजा दी? छत्तीेसगढ़ पुलिस ने पीयूसीएल नेता डॉ. बिनायक सेन को जन सुरक्षा कानून के अंतर्गत 14 मई 2007 को गिरफ्तार किया था। बिनायक सेन को देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने, लोगों को भड़काने, प्रतिबंधित माओवादी संगठन के लिए काम करने के आरोप में दोषी करार दिया गया था और 24 दिसंबर 2010 को अदालत ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। और सजा के बाद जैसी अपेक्षा थी कई बुद्धिजीवी सामने आये और नई दिल्ली के जंतर मंतर पर विचारों, कविताओं और गीत-संगीत के जरिये अपना विरोध दर्ज कराने के लिए अर्पणा सेन, शार्मिला टैगोर, गिरीश कर्नाड, गौतम घोष, अशोक वाजपेयी व रब्बी शेरगिल जैसी कई जानीमानी हस्तियों ने पत्र लिखकर विनायक सेन के लिए न्याय की मांग की। डॉ. बिनायक सेन के मुकदमे के पेरवी बी.जे.पी. के राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ वकील रामजेठ मालानी कर रहे हैं जेठमलानी साहब का पता नही की कब वो वकील की हेसियत से काम करते हैं…..और कब राजनेता के रूप में .........?

58 वर्षीय डा.विनायक सेन शिशु रोग विशेषज्ञ है, जिसका जन स्वास्थ्य अधिकारी के रूप में राज्य के आदिवासियों को सेवाएं प्रदान करने का 25 सालों का रिकार्ड है। सेन ने वेल्यूर के सीएमसी (क्रिश्चन मेडिकल कॉलेज) से स्नातक की डिग्री हासिल की थी। 2004 में उसे पॉल हैरिशन नामक अवार्ड से नवाजा गया था। लंबे समय तक बिनायक ने चिकित्सा के क्षेत्र में सेवाएं देने के साथ-साथ दूसरे कामों में भी समय दिया। राज्य मितानिन कार्यक्रम के तहत उसे राज्य सरकार के साथ काम करने का मौका मिला। पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के समय में वो स्वास्थ्य विभाग के अतंर्गत राज्य सलाहकार कमेटी के सदस्य के पद पर नियुक्त रहे। धीरे-धीरे सेन ने नागरिक आजादी और मानव अधिकार के कार्यो में रुचि बढ़ाई और वह राज्य के ऐसे सबसे पहले व्यक्तियों में गिने जाने लगे, जिन्होंने धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ प्रदेश में भूखमरी और कुपोषण के खिलाफ एक खोजी रिपोर्ट तैयार की। उसी समय उन्हें पीयूसीएल (पीयूपल्स यूनियन फॉर सिविल लीबरटिस) का राज्य अध्यक्ष और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष चुना गया। उन्होंने सलवा जुडूम के खिलाफ लोगों का सबसे पहले ध्यान आकर्षित किया था। इसके बाद से ही उन पर नक्सलियों को समर्थन देने और उनके उद्देश्य के तहत काम करने का आरोप लगा। बाद में पुलिस ने इसकी गंभीरता से जांच की, उनकी गिरफ्तारी हुई और फिर पिछले दो सालों से इस मामले में मुकदमा चलता रहा।

चूंकि वे राष्ट्रीय स्तर पर संगठन के उपाध्यक्ष रहे, इसलिए उनके खिलाफ देशद्रोह के तहत युद्ध की योजना बनाने के लिए भी धारा लगाई गई। बाद में इसके ठोस सबूत नहीं मिल सके। जहाँ एक और शंकर गुहा की आवाज मिल मजदूरो के लिए उठी पर हमेशा के लिए दबा की गई , वही विनायक सेन की आवाज सलाखों के पीछे धकेल दी गई , पर विनायक सेन शायद इस बात को जानते थे की वो जो करने जा रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा ...........!

देश में आर्थिक उदारीकरण का दौर नब्बे के दशक में जब से शुरू हुआ तब से भारत दो पाटो में पिसना शुरू हो गया था जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा मध्यम वर्ग को उठाना पड़ा
अगर आज महाराष्ट्र के विधर्भ में सबसे ज्यादा किसान आत्महत्या कर रहे हैं तो उसी क्षेत्र में सबसे ज्यादा मर्सडीज़ या बी.एम.डब्लू. कारें सड़क पर उतरती हैं , औरंगाबाद में 113 मर्सडीज़, 101 बी.एम.डब्लू. और वही महाराष्ट्र के पश्चिमी समर्द्ध इलाके जेसे कोहलापुर, सांगली में डॉक्टर ,उद्योगपति और किसान तक़रीबन 180 इम्पोर्टेड कारों की बुकिंग करवातें हैं यानि जो सामाजिक विसंगति पैदा हुई हैं वही आज की परिस्थिति के लिए ज़िम्मेदार हैं और जो इस विसंगति को दूर करने के लिए आवाज उठता हैं वो सरकार विरोधी या विकास में बाधक माना जाता हैं |
विनायक सेन अगर दिल्ली के पॉश इलाके या किसी न्यूज़ चेनल के स्टूडियो में बैठ कर नक्सली इलाको में सुधार की बात करते या फिर नक्सलियों की मांगो को जायज ठहराते तो उनको कम से कम सजा तो नही मिलती पर उन्होंने देवता रूपी चिकित्सक के पेशे को किसी मल्टीस्टार हॉस्पिटल के बजाय छत्तीसगढ़ के आदिवासी इलाको में इस्तेमाल करने का फैसला किया और जब से उन्हें उम्रकेद की सजा हुई हैं तब से कई बुद्धिजीवी जिसमे लेखक , कलाकार , छात्र संघटन शामिल हैं , उनकी रिहाई की मांग उठा रहे हैं ,……….ये आवाज शिबू सोरेन, कलमाड़ी या पूर्व दूरसंचार मंत्री राजा सरीखे व्यक्तियों के मामले में नही उठी , जो भ्रष्टाचार के मामलो में आरोपी हैं , और जो रकम इन लोगो ने हड़पी हैं वो देश की आवाम की हैं, पर वो उन लोगो तक नही पहुँच पाई जिन पर उनका हक था ........और अपने इसी हिस्से को हासिल करने ले लिए कुछ लोग आन्दोलन करते हैं और कुछ सीधे बन्दुक का सहारा लेतें हैं पर इसे विडम्बना कहे या दुर्भाग्य जो व्यवस्था के शिकार हैं वो दोषी माने जातें हैं और जिनके कारण ये सब हुआ हैं वो शासन में भागीदारी रखते हैं

डॉ सेन पर कई विचारक लिखते हैं की, आखिर सेन ने अपने काम के लिए भारत में छत्तीसगढ़ ही क्यों चुना .....? उनके अनुसार विचारो के आवेश और मृग मरीचिका में आकर विनायक सेन, कानू सान्याल , चारू मजुमदार , कोबाद गाँधी जैसे लोग इस तरह की विचारधारा को अपना लेते हैं ..........
पर हाथ पर हाथ धर कर या सिर्फ सुझाव देकर किसी समस्या से निजात नहीं मिलती |
04 फरवरी 2011 को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने एक फैसले में कहा हैं की कोई भी प्रतिबंधित संघठन की सदस्यता से कोई भी व्यक्ति अपराधी नही बन सकता ..........जब तक कोई व्यक्ति हिंसा में शामिल न हो या हिंसा के लिए लोगो को न उकसाए , उसे अपराधी नही माना जायेगा ......." अदालत ने यह आदेश प्रतिबंधित उग्रवादी संघठन उल्फा के कथित कार्यकर्ता अरूप भुईया के मध्य नज़र दिया | दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 124 के तहत अगर कोई व्यक्ति या संगठन जो शासकीय व्यवस्था को कोसते हों या सुधारने की कोशिश करते हों, तो उसे राज्य के खिलाफ युद्ध नहीं माना जाना चाहिए।
क़ानून हमें अभिव्यक्ति और अपने अधिकारों के प्रति सजग रहने को कहता हैं लेकिन कोई भी सरकार न तो अधिकारों को जनता को दिला पाई हैं बल्कि जनता को उनके कर्तव्यों का बोध कराने लगती हैं |
हाल ही में महाराष्ट्र का वाकया सबके सामने हैं ..........पदमश्री पुरुष्कार प्राप्त विश्वविख्यात आदिवासी चित्रकार जिव्या मसे को 34 साल के संघर्ष के बाद ज़मीन मिली, ये ज़मीन उन्हें 1976 में राष्ट्रपति फखरूदीन अली अहमद द्वारा दी गई थी पर लम्बे संघर्ष के बाद आखिर राहुल गाँधी के महाराष्ट्र दौरे पर खुद राहुल गाँधी ने तीन एकड़ भूमि के कागजात उन्हें सोपे पर जिन्दगी 34 साल उन्होंने इसे भंवर में उलझकर बिता दिए ........ये सब घटनाये समाज के सामने चुनोतियाँ हैं क्योकि इन्ही की वजह से एक इन्सान सिस्टम के खिलाफ खड़ा होता हैं |
बात सिर्फ एक विनायक सेन को सजा को लेकर नहीं हैं , बल्कि इस बात को लेकर हैं की सरकार अपने नागरिको को लेकर कितनी सजीदा हैं, क्या नागरिको को ही राष्ट्रधर्म निभाना होगा और प्रशासन अपना सेवा धर्म भूलता जा रहा हैं, सर्वोच्च न्यायलय को देश की सर्वोच्च संसद को आज उसकी ज़िम्मेदारी याद दिलानी पड़ती हैं .............परिवर्तन की ये आहट किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए घातक हैं खासकर भारत जैसे देश के लिए जिसके बड़ी आबादी युवा हैं और वह एक बेहतर भविष्य की आस में हैं हाल ही में अरब देशो में हुआ घटना क्रम इसका सबसे ताज़ा उदहारण हैं |टयूनीशिया, यमन, मिस्त्र , सूडान में जो आक्रोश वहां की जनता ने दिखाया वो एक सबक हैं , जहाँ शासन के विरुद्ध आक्रोश दिखने वाले ज़्यादातर युवा हैं ,सरकार को युवाओं के बेहतर भविष्य का ज़िम्मा बखूबी निभाना चाहिए........,जिससे हमारे देश की राष्ट्रीय अस्मिता पर कोई आंच न आये




Tuesday, December 7, 2010

Time To Big-Switch


Mr. and Mrs. Chauhan is professionally farmer & have their own apple farm near Shimla. Their single son Nitin is modern youth, which is full of modern thoughts, that is to say parents & Nitin both are on 180 degree at their Brooding. Where, father wants to push their ancestral business that the same Nitin don’t agree with father and he want to chose new line, Nitin Chauhan is a tattoo artist who has a successful business in Chandigarh. Latter, The Gulatis are sent in as replacement parents …………” that isn’t a film script, yes this is true story of UTV BINDAAS program Big Switch -2.The program which is based on family and admirable initiative for decries generation gap.

In India, beginning of 90 decade, the TV revolution has begun and changes everything, several entertainments, news channels came in front of audiences. From this, the profit also grows like a Bamboos tree. Changing is law of nature……..this motto has been copied by TV industries and to entertainment, for entertainment, only entertainment became a tag line of several channels and they dished up anything in audiences Plate.
Every channels has different kind of viewer ship, UTV BINDAAS is youth based channel. The idea and concept of this program is new like a bridge between two generation new & old. The Show creates a situation for the contestants to switch their wrong attitude in the right. It is a reality TV Show which introduces the real problem of children and their parents. TV channels are strong medium which spread effect on audiences directly like a antibodies. TV shows don’t requires permission certificate before broadcasting but in case of film this is essential to get A,U or A/U certificate from ministry of I&B. The plus point of this program is that there is no vulgarity and also anchor Gaurav Kapoor don’t use beep sound language. He is a well known face after T20 World Cup. He has already hosted many TV and Radio Shows. Now, he is being seen in Big Switch 2 on Bindass TV.
The reality ends with special guest and part of the family jury. He adds a great deal of perspective to the judging process using personal stories from his own childhood, anecdotes, and even a couple of parables from mythology to steer the jury towards a unanimous decision. Nitin is declared the winner. But the whole family is thrilled as they are together again, and father and son can now express their love and respect for each other. They say they are forever indebted to the Big Switch for bringing them together. After all we can say that this is good beginning to manage or built relationship between families, this kind of shows are essential in current era. Meanwhile, other Entertainment channels should imitate that type of shows.