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जट दी अरदास

मै पूत हां किसान दा ... गल करदा तकळे वन्गू सीदी
मै इसी मिट्टी दे विच जमया हां.... ऐहे जमीन साडी मां हुंदी,
दिल्ली दी संसद चे बह के तुस्सी करदे हो गल साडे हक दी,
पर दिल्ली नहीं जानदी गल साडे दिल दी,
बणिये , साहुकारां ते पत्रकारा नूं वल अपणे करके सरकारा सानू फायदे दसदी हैं
पर जट दे पांव जडों जमीन दे पैदे हैं ता साडी जमीन भी हंसदी हैं....ते कहदी हैं...
जटा अज गल तेरी पग ते आ खड़ी हैं.... सभाल पग अपणी,
भावे पेजे अज 32 बोर चकणी....
एक एक दे गीटे भन्न दई.... गल बद जे ता वेरीया नू सफेदेया दे टंग दई....
पर जटा मै तेरी माँ हां... मां दी राखी लई तू अपणा शीश वी ला दई...
अज दिया सरकारा नूं साडी लगदा फिक्र बाळी हैं...
पर ओना नू की पता होदा की पंजाळी हैं....
औहो झूटे लंदे 20 लख दी गडिया ते,,, मै झूटे लंदा हा 20 फुट लम्बे सुहागे ते....
बस करो सियासत दे बंदयो....तुहाडे झास्या चे नहीं आणा.... तुस्सी ता हो ही इने झूटे की साख करादो ...
भांवे बंदा होवे काणा....

बस ईनी जेही विनती हैं कि अपनी भेड़ी नज़रा दूर रखों साड़ी पेळीया तो...

Comments

jasveer singh said…
nice lines Rajeev JI,,,,,,,,,,
RANJAN BHARTI said…
Yes there are huge differences between rural & urban india

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